आखिर कौन था भरत तिवारी ? जिसके पुलिस 'एनकाउंटर' पर उठ रहे नित नए सवाल, बिहार की राजनीति में जन्म ले रहा है एक नया प्रतीक

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अंजनी कुमार/नई दिल्ली

वैसे यह सवाल गंभीर है और पुलिस व प्रशासन की नीति व मंशा दोनों को सवालों के घेरे में लाता हुआ दिखता है लेकिन इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि बिहार की राजनीति में अक्सर ऐसे घटनाक्रम सामने आते हैं जो धीरे-धीरे केवल  कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाते, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र भी बन जाते हैं। ठीक उसी तरह भरत तिवारी की मौत भी अब तक ऐसी ही एक घटना बनती दिखाई दे रही है। हालांकि, आगे यह क्या रुख अख्तियार कर सकती है इस पर अभी कुछ कहना महज एक अतिश्योक्ति ही होगी। यही कारण है कि सोशल मीडिया जिसका उपयोग अधिकतर देश के युवा वर्ग करता हुआ दिखता है वह उन्हें पर उन्हें जहां  "शहीद" बताने से गुरेज नहीं कर रहा है, तो कुछ उसकी तुलना शहीद-ए-आजम भगत सिंह तक से कर रहे हैं। तो दूसरी ओर, सरकार और प्रशासन है जो इस पूरे मामले को अब तक अलग नजरिए से देखते आ रहे हैं और एक बड़ी पर अशांत कर देने वाली चुप्पी साधे हुए है।

उक्त मामला बहरहाल सबसे बड़ा सवाल यह उठाता है कि क्या यह मामला बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है, या फिर यह भी कुछ समय बाद अन्य विवादों की तरह अपने आप शांत हो जाएगा? इसीलिए यह भावनाओं की तह में न जाकर तथ्यों की परख व पड़ताल दोनों जरूरी हो जाता है किसी भी लोकतांत्रिक समाज में किसी व्यक्ति की पुलिस कार्रवाई के दौरान हुई मौत गंभीर विषय होती है और यदि आरोप लगते हैं कि व्यक्ति को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उसने प्रशासन या व्यवस्था पर सवाल उठाए, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बन जाता है। वहीं, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले न्यायिक प्रक्रिया, जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों का इंतजार करना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है। यही कारण है कि भरत तिवारी की मौत को लेकर उठ रही भावनाओं और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच तथ्यों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी।

बिहार की राजनीति और प्रतीकों की ताकत

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार की राजनीति केवल चुनावी समीकरणों से नहीं चलती, बल्कि प्रतीकों और भावनात्मक मुद्दों से भी गहराई से भी प्रभावित होती रही है। इतिहास बताता है कि कई बार किसी एक घटना ने बड़े राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया है। यदि किसी व्यक्ति को समाज का एक वर्ग अन्याय का शिकार मानने लगे, तो वह धीरे-धीरे एक राजनीतिक प्रतीक बन सकता है। सोशल मीडिया के दौर में यह प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हो गई है।

इसी वजह से भरत तिवारी को लेकर "शहीद" या "व्यवस्था के खिलाफ आवाज़" जैसी छवि बनाने की कोशिशें भी देखने को मिल रही हैं। तो क्या यह सवाल उठा सकता है कि भरत तिवारी मामले में आगे जाकर क्या कतिपय जातीय समीकरण जुड़ सकते हैं और इस मसले को राजनीतिक रंग देने का कुत्सित प्रयास भी किया जा सकता है।  यही कारण है कि भरत तिवारी की मौत केवल एक व्यक्ति के मारे जाने का मामला भर नहीं रह गया है बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, पुलिस कार्रवाई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया की राजनीति और बिहार के जातीय समीकरणों जैसे कई संवेदनशील विषयों से भी जुड़ता जा रहा है।

फिर भी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यही होता है कि भावनाओं से अधिक महत्व तथ्यों और निष्पक्ष जांच को दिया जाए। किसी को दोषी या किसी को शहीद घोषित करने से पहले न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना आवश्यक है। यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होती है, तो सत्य सामने आएगा। लेकिन यदि यह मामला केवल राजनीतिक नारों और जातीय ध्रुवीकरण तक सीमित रह जाता है, तो इससे समाज में विभाजन और अविश्वास ही बढ़ेगा। आने वाले समय में भी यह स्पष्ट हो पायेगा कि भरत तिवारी की मौत बिहार की राजनीति में एक क्षणिक विवाद बनकर रह जाती है या फिर वह एक ऐसे प्रतीक में बदलती है, जिसके इर्द-गिर्द नई राजनीतिक बहस खड़ी होती है। क्योंकि बिहार की राजनीति में जाति आज भी सबसे प्रभावशाली कारकों में से एक है। यदि किसी घटना को किसी विशेष जाति के सम्मान, उत्पीड़न या राजनीतिक उपेक्षा से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

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ऐसी स्थिति में कई संभावनाएं जन्म ले सकती हैं

इसके कारण संबंधित और एक खास वर्ग के भीतर भावनात्मक एकजुटता बढ़ सकती है जिसे राजनीतिक दल उस वर्ग को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर सकते हैं। वहीं, इस घटना को कानून-व्यवस्था से हटाकर सामाजिक न्याय के मुद्दे के रूप भी में पेश किया जा सकता है। हां इस बात से नहीं किया जा सकता है चुनावी सभाओं और राजनीतिक अभियानों में इसका उल्लेख बढ़ सकता है और वहां यह घटना थोड़ी बहुत राजनीतिक हलचल पैदा कर सकता है। यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होती है, तो सत्य सामने आएगा। लेकिन यदि यह मामला केवल राजनीतिक नारों और जातीय ध्रुवीकरण तक सीमित रह जाता है, तो इससे समाज में विभाजन और अविश्वास ही बढ़ेगा।

यही कारण  है कि आने वाले समय में भी यह स्पष्ट हो पायेगा कि भारत तिवारी की मौत बिहार की राजनीति में एक क्षणिक विवाद बनकर रह जाती है या फिर वह एक ऐसे प्रतीक में बदलती है, जिसके इर्द-गिर्द नई राजनीतिक बहस खड़ी होने की बात भी शिद्दत से कही जा सकती है। पर इस मामले पर कुछ बड़ी सियासत की जा सकती है, पार्टियां राजनीतिक रोटी सेक सकती है इसे बहरहाल खारिज कर देना ही बेहतर होगा। हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि समाज इस घटना को किस रूप में स्वीकार करता है।

सोशल मीडिया की नई राजनीति 

आज किसी भी घटना का पहला राजनीतिक मंच सोशल मीडिया बन चुका है। यहां हैशटैग, वीडियो, भावनात्मक पोस्ट और ऐतिहासिक तुलना बहुत तेजी से जनमत को प्रभावित करती हैं। भरत तिवारी की तुलना भगत सिंह से किया जाना भी इसी डिजिटल राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है। लेकिन इतिहास के महान स्वतंत्रता सेनानियों से तुलना करना अत्यंत गंभीर विषय है। ऐसी तुलना भावनात्मक हो सकती है, परंतु उसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता। उक्त घटना सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए अवसर के दरवाजे भी खोल सकता है क्योंकि यदि यह मामला लंबा चलता है तो विपक्ष इसे सरकार की जवाबदेही, पुलिस सुधार और लोकतांत्रिक अधिकारों का मुद्दा बना सकता है।

ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी-वो आखिर क्या होगी वह यह कि सत्ता पक्ष को निष्पक्ष जांच कराकर विश्वास कायम करने की निहायत जरूरत होगी वहीं, उसे यह संदेश देना भी होगा कि कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है। वहीं, अगर जांच पारदर्शी नहीं दिखती, तो विपक्ष को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है जिसे सत्ता पक्ष कभी होते हुए देखना नहीं चाहेगा कारण  यदि जांच में प्रशासन का पक्ष मजबूत साबित होता है, तो सरकार अपने रुख को सही ठहराने का प्रयास करेगी। तो क्या मसले को चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है जो कि इस वक्त का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल भी है।

लेकिन अभी निश्चित नहीं क्योंकि किसी घटना के चुनावी मुद्दा बनने के लिए केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं होती। उसके लिए आवश्यक है लंबे समय तक जनचर्चा बने रहना, वहीं विभिन्न सामाजिक संगठनों का समर्थन मिलना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है वहीं, विपक्ष किसी भी कीमत पर इसे उठाकर जनभावना को प्रभावित न करने से गुरेज नहीं करेगी। और जांच में ऐसे तथ्य सामने आना जो जनता की धारणा को प्रभावित करेगी यदि ये सभी परिस्थितियां बनती हैं, तो भरत तिवारी का मामला आने वाले चुनावों में भी सुनाई दे सकता है।

निष्कर्ष तो यहां यही लगता दिखता है कि आखिर यह घटना महज एक व्यक्ति जिसका नाम भरत तिवारी था क्या उसकी मौत के साथ अनगिनत व अनुत्तररित सवाल छोड़ जाएगा या फिर यह उक्त मसले को कहां से कहां तक पहुंचा सकता है। ऐसे में भरत तिवारी की मौत केवल एक व्यक्ति की महज मौत का मामला नहीं रह गया है  बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, पुलिस कार्रवाई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया की राजनीति और बिहार के जातीय समीकरणों जैसे कई संवेदनशील विषयों से जुड़ता जाता दिख रहा है।

फिर भी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यही है कि भावनाओं से अधिक महत्व तथ्यों और निष्पक्ष जांच को दिया जाए। किसी को दोषी या किसी को शहीद घोषित करने से पहले न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना आवश्यक है। यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होती है, तो सत्य सामने आएगा। लेकिन यदि यह मामला केवल राजनीतिक नारों और जातीय ध्रुवीकरण तक सीमित रह जाता है, तो इससे समाज में विभाजन और अविश्वास ही बढ़ेगा।

आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि भरत तिवारी की मौत बिहार की राजनीति में एक क्षणिक विवाद बनकर रह जाती है या फिर वह एक ऐसे प्रतीक में बदलती है, जिसके इर्द-गिर्द नई राजनीतिक बहस खड़ी होती है। भरत तिवारी के फ़ेसबुक लाइव, सरेंडर के दावे और न्यायिक जांच के आदेश ने इस घटना को 'फ़र्ज़ी एनकाउंटर' से 'एनकाउंटर राज' की बहस तक पहुंचा दिया है।

ऐसे में जेहन में यह प्रश्न उठता है कि आख़िर कौन थे भरत भूषण तिवारी, जिनके 'एनकाउंटर' ने राजनीतिक और क़ानूनी तौर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शाहपुर के जवइनियां गांव में के मुहाने पर भरत तिवारी की तस्वीर के साथ एक बड़ा बोर्ड लगाया गया है। जिस पर लिखा है-'शहीद भरत नगर जवइनियां, आपका बलिदान सदैव स्मरणीय रहेगा। यहां के ग्रामीण कहते हैं कि यह नाम भरत तिवारी की श्रद्धांजलि में लोगों ने रखा है।

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ये वही गांव है जहां बीती 17 जून को पुलिस ने भरत तिवारी का 'एनकाउंटर' किया, जिसके बाद इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। हालांकि, भोजपुर के एसपी की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ के अनुसार, "पुलिस टीम ने ख़ुद और लोगों की सुरक्षा के लिए गोली चलाई थी, जो भरत भूषण के पांव में लगी." जवइनियां गांव के लोग पुलिस के इस दावे को ग़लत बताते हैं। इन गांव वालों का कहना है कि अगर भरत तिवारी ने इस गांव के लिए आवाज़ नहीं उठाई होती तो शायद पुनर्वास, बिजली और पानी के मुद्दे भी सामने नहीं आते। कई गांव वाले हमसे बातचीत में दावा करते हैं, "भरत ने हमारी मांग के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।" जवइनियां से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर बिलौटी गांव में आरा-बक्सर राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक सरकारी स्कूल है। इसके सामने भरत का निर्माणाधीन एक मंज़िला मकान है। यहां उनके माता-पिता से मिलने लगभग हज़ारों की संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण, मीडियाकर्मी और विभिन्न दलों के नेताओं के आने का सिलसिला लगातार जारी है। घर के बरामदे में भरत के 70 वर्षीय पिता काशीनाथ तिवारी भीड़ से घिरे रहने के बावजूद बेटे की मौत के सदमे से बेसुध दिखते हैं।

वहीं, भरत की मां 57 वर्षीय आशा देवी घर के एक कमरे में गांव और रिश्तेदारी की महिलाओं के बीच रोते हुए एक ही बात बार-बार कहती हैं, "पुलिस ने मेरे सामने ही मेरे बेटे को गोली मार दी, ऐसे तो किसी उग्रवादी को भी नहीं मारा जाता है। मेरा बेटा समाजसेवक था। पुलिस ने उसे क्यों मार डाला?"

घर के बरामदे पर बैठे भरत के बड़े भाई 35 वर्षीय वसंत तिवारी अपने छोटे भाई के साथ आंखों में आंसू भरे चुपचाप अपनी मां और पिताजी को देख रहे हैं। उधर, वसंत तिवारी अपने भाई को याद करते हैं कि भरत उनके चारों भाई-बहनों में सबसे प्रतिभाशाली था। उसने आरा कॉलेज से बीएससी तक पढ़ाई की थी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहा था। उन्होंने बताया, "भरत ने समाजसेवा के लिए शादी न करने का फ़ैसला लिया था। शादी के लिए कोई मजबूर न करे, इसके लिए भरत ने करीब 10 साल पहले अपनी मर्ज़ी से ख़ुद का पिंडदान किया था और अंगदान का भी प्रण लिया था."

ग्रामीण विनय कुमार कहते हैं, "निडर, चंचल मन और सभी धाराओं में बहने वाला जवान ख़ून था। वो अति उत्साही ज़रूर था लेकिन बात सही बोलता था और काम समाज के लिए ही करता था." क्या भरत भूषण तिवारी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड था? वैसे भरत भूषण का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था पर बीते साल 24 मार्च 2025 को शाहपुर थाने के दारोगा रामाशंकर बैठा ने उन पर एक एफ़आईआर दर्ज कराई थी। इस एफ़आईआर के मुताबिक, "ज़मीन विवाद संबंधित काग़ज़ात मांगे जाने पर भरत भूषण तिवारी ने मौजूद दारोगा रामाशंकर बैठा का कॉलर पकड़ लिया और धक्का-मुक्की की."प्राथमिकी में दो सिपाहियों के घायल होने का भी उल्लेख किया गया है।

इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के अलावा एससी/एसटी एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया गया था। कहा जाता है कि भरत तिवारी अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर स्थानीय मुद्दों को उठाने और सत्ता से सवाल पूछने वाले पोस्ट किया करते थे और कई पोस्ट में उन्होंने जवइनियां गांव का मुद्दा उठाया था। उन्होंने एक फ़ेसबुक पोस्ट करके सरकारी कामकाज के तरीक़े पर नाराज़गी जताई थी और एक अधिकारी का 'एनकाउंटर' करने की बात कही थी.  उनका यह पोस्ट वायरल होने के बाद स्थानीय पुलिस उनके घर गई. पुलिस का दावा है कि उन्होंने भरत तिवारी को समझाने की कोशिश भी कि लेकिन उन्होंने (भरत ने) पिस्टल निकाल ली।

भरत तिवारी के बारे में यह भी कहा जाता है उसने फ़ेसबुक पर 16 जून की रात से लेकर 17 जून की सुबह तक 10 लाइव किया। जिसमें पुलिस द्वारा उनके घर को घेरने, भरत द्वारा पुलिस पर पिस्टल लहराने और कथित एनकाउंटर वाले वीडियो शामिल हैं। उसके फ़ेसबुक पर 6,000 फॉलोअर्स थे लेकिन 16 जून के बाद फॉलोअर्स की संख्या ख़बर लिखे जाने तक दो लाख 49 हज़ार हो गई। 

यही नहीं, उसके के फ़ेसबुक पेज पर भगत सिंह और महात्मा गांधी समेत नेल्सन मंडेला के संदेश और उनकी जीवनी वाले वीडियो दिखाई दे रहे हैं। वह खुद को यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का फ़ैन और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से प्रभावित बताता हुआ भी दिखता है। वह अपने सोशल मीडिया पर हथियारों से जुड़े वीडियो भी शेयर करता  था। साल 2023 में वो बिहार के भोजपुर से बागेश्वर धाम तक पैदल यात्रा कर चुका था। इस यात्रा के दौरान उनके कई वीडियो और फ़ोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे. यहां उसकी मुलाक़ात धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से हुई।

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क्या है जवइनियां गांव की कहानी ?

ग्रामीण विनय कुमार ने बताया कि शाहपुर प्रखंड का जवइनियां गांव, पिछले साल जुलाई में भयंकर कटाव और बाढ़ के कारण गंगा नदी में विलीन हो गया था। इस त्रासदी ने 350 से अधिक घरों को उजाड़ दिया और 1500 से ज़्यादा लोग रातों-रात बेघर हो गए। फिर पुनर्वास के लिए पहले खेप में लगभग 70 ग्रामीणों को बिहार सरकार ने शाहपुर में रहने के लिए जमीन दी। ग्रामीणों का कहना है कि भरत तिवारी ने पुनर्वास का मुद्दा सोशल मीडिया पर ज़ोर-शोर से उठाया और वे इसी वजह से भरत के साथ बेहद जुड़ाव महसूस करते हैं। गांव वाले बड़े अफसोस के साथ कहते है कि इसी गांव के मुहाने पर भरत का 'एनकाउंटर' किया गया। वहीं, गांव की तेतरी देवी रोते हुए कहती हैं, "एक तो सरकार ने हमारे साथ धोखा किया, हमको पानी से निकालकर पानी में ही डाल दिया है। यहां से नदी काफ़ी नज़दीक है। जब पानी भरता है तब ये पूरा इलाका भी डूब जाता है। बाढ़ आने या जलजमाव होने पर तो लोगों के घरों में पानी घुस जाएगा, छोटे-छोटे बच्चे हैं, डूबने की भी आशंका रहती है। भरत इसी गड्ढे को भरने की मांग लगातार कर रहे थे लेकिन पुलिस ने उन्हें मार दिया।

ग्रामीणों के इस आरोप पर भोजपुर के ज़िलाधिकारी तनय सुल्तानिया से फ़ोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन अभी उनका जवाब नहीं मिल पाया है। जवाब आते ही इस रिपोर्ट में उसे शामिल किया जाएगा। भरत के दोस्त और ग्रामीण गणेश बताते हैं, "यही तो दुर्भाग्य है कि ज़िन्दा रहते हुए उसका साथ किसी ने नहीं दिया। वो बेचारा अकेले ही लड़ता रहा प्रशासन से।

इस मामले में अब तक क्या-क्या हुआ ?

'एनकाउंटर' के मामले ने तूल पकड़ा तब घटना के तीन दिन बाद प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए शाहपुर थाना अध्यक्ष समेत पांच पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया है। साथ ही, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए हाईकोर्ट के रिटायर जज के द्वारा न्यायिक जांच कराने का निर्णय लिया है। वहीं, भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद 22 जून को पहली बार मीडिया के सामने आए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) सुधांशु कुमार ने इसे पुलिस की लापरवाही माना है। उन्होंने कहा, "एनकाउंटर से पहले 16 जून को जो पुलिस वाले उससे बात करने गए, वह उसे ठीक से हैंडल नहीं कर पाए। इस मामले में शाहपुर थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष राजेश मालाकार ने भरत के पिता काशीनाथ तिवारी और एक नाबालिग भाई पर प्रथामिकी दर्ज की, उन पर भरत को संरक्षण देने और अवैध हथियार की जानकारी का आरोप लगाया गया। 

एफआईआर में दावा किया गया था कि भरत के सोशल मीडिया पर पिस्टल के साथ कई वीडियो पहले से वायरल हो चुके थे। बावजूद परिवार ने पुलिस को सूचना नहीं दी, जिससे यह प्रतीत होता है कि दोनों भरत को अवैध हथियार रखने में संरक्षण दे रहे थे। बाद में मीडिया में ऐसी ख़बरें आईं कि ये एफ़आईआर वापस ले ली गई है। इस पर भरत भूषण तिवारी के बड़े भाई वसंत तिवारी का कहना है, "अब तक उन्हें इस संबंध में कोई लिखित आदेश या आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं मिले हैं।" वसंत तिवारी ने मांग की है कि अगर अगर पुलिस यह कहती है कि भरत तिवारी का नाम केस से नाम हटा दिया गया है, तो इसके लिए लिखित प्रमाण दिया जाए। साथ ही उन्होंने इस मामले की जांच सेवानिवृत्त न्यायाधीश से नहीं बल्कि वर्तमान जज से कराई जाए।

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