हिंदी पत्रकारिता दिवस: जब कलम बनी आजादी की आवाज, अब TRP और फेक न्यूज के दौर में नए सवाल

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नई दिल्ली: जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाना भी खतरे से खाली नहीं था, तब कुछ पत्रकारों ने बंदूक नहीं बल्कि कलम को अपना हथियार बनाया। किसी ने जेल की यातनाएं झेलीं, किसी ने राजद्रोह के मुकदमे सहे तो किसी ने देश और समाज को जागरूक करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी पत्रकारिता को समर्पित कर दी। यही विरासत हर साल 30 मई को मनाए जाने वाले हिंदी पत्रकारिता दिवस की अहमियत को रेखांकित करती है।

30 मई 1826 को कोलकाता से पहला हिंदी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड प्रकाशित हुआ था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा शुरू किए गए इस समाचार पत्र को हिंदी समाज की पहली संगठित आवाज माना जाता है। इसी ऐतिहासिक शुरुआत की स्मृति में हर वर्ष हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है।

उस दौर में पत्रकारिता केवल खबरों तक सीमित नहीं थी। यह जनजागरण, सामाजिक चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज थीं। अखबार सत्ता को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि जनता को जागरूक करने और अन्याय के खिलाफ खड़ा होने के लिए निकाले जाते थे।

जब पत्रकारिता बन गई राष्ट्रसेवा का माध्यम 

अलीगढ़ की धरती ऐसे कई पत्रकारों की गवाह रही है, जिन्होंने पत्रकारिता को पेशा नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाया। वरिष्ठ पत्रकार होटीलाल वर्मा उन शुरुआती राष्ट्रवादी पत्रकारों में थे, जिन्हें साल 1908 में सरकार विरोधी टिप्पणी वाले टेलीग्राम के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला और छह वर्ष की काला पानी की सजा सुनाई गई। उस दौर में विचार लिखने की कीमत जेल और सजा हुआ करती थी।

इसी तरह विजयगढ़ निवासी रमेश चंद्र आर्य, जो ‘वीर अर्जुन’ समाचार पत्र के सह-संपादक थे, अलीगढ़ स्टेशन बम कांड के बाद गिरफ्तार किए गए। अंग्रेजी हुकूमत उन पर क्रांतिकारियों के नाम उजागर करने का दबाव बना रही थी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। जेल में दी गई यातनाओं के चलते 18 जून 1943 को उनकी मृत्यु हो गई।

मदनलाल हितैषी ने पत्रकारिता को जनजागरण का हथियार बनाया। बचपन में यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने वाले हितैषी बाद में स्वतंत्रता आंदोलन और अखबारों के जरिए राष्ट्रीय चेतना की आवाज बने। वहीं, अक्षय कुमार जैन ने अपनी लेखनी के जरिए राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया, जबकि भगवान दास गौतम ने साइमन कमीशन के विरोध में काला झंडा दिखाकर अंग्रेजी शासन का खुला विरोध किया और राजद्रोह के आरोप झेले। इन पत्रकारों की सबसे बड़ी ताकत उनकी निर्भीकता थी। वे सिर्फ खबर नहीं लिख रहे थे, बल्कि इतिहास गढ़ रहे थे।

डिजिटल दौर में नई चुनौतियां 

समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। अब खबरें अखबार के अगले दिन नहीं बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर सेकेंडों में पहुंच जाती हैं। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को नई गति दी है, लेकिन इसके साथ कई गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं।

एक तरफ आर्थिक दबाव, दूसरी तरफ राजनीतिक ध्रुवीकरण और फेक न्यूज का खतरा पत्रकारिता को प्रभावित कर रहा है। सबसे पहले खबर देने की होड़ में कई बार तथ्यात्मक शुद्धता भी चुनौती बन जाती है। ग्राउंड रिपोर्टिंग घटती दिखाई देती है, जबकि स्टूडियो आधारित बहसों और शोर का दायरा बढ़ा है। ऐसे में यह सवाल लगातार उठता है कि क्या पत्रकारिता अपनी मूल आत्मा-जनता के सवाल उठाने और सत्ता से जवाब मांगने-की भूमिका को उसी मजबूती से निभा पा रही है ?

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पत्रकारिता बचाना क्यों जरूरी है ?

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यदि पत्रकारिता सवाल पूछना छोड़ दे, तो जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है। सच और अफवाह के बीच की रेखा धुंधली पड़ने लगे तो समाज भ्रमित होता है और जनता की आवाज कमजोर होने लगती है।

हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल एक ऐतिहासिक तारीख नहीं, बल्कि उस विरासत को याद करने का अवसर भी है जब पत्रकारिता जिम्मेदारी, साहस और जनपक्षधरता का प्रतीक थी। ऐसे दौर में, जब सूचना की गति तेज है, पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता और सच के प्रति प्रतिबद्धता को बनाए रखने की है।

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