Ganga Protection Movement: देश के सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण वैज्ञानिक और आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने गंगा नदी के संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन बलिदान कर दिया था और 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया।
ऋषिकेश: जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे सोनम वांगचूक के बीच एक बार फिर पर्यावरणविद् और गंगा संरक्षण के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले प्रोफेसर जीडी अग्रवाल इन दिनों चर्चा में है। सोशल मीडिया पर लोग उनका देश के प्रति जो बलिदान था उसको याद कर रहे हैं। प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को संन्यास लेने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से जाना गया, वे उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में एक थे जिन्होंने प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों की सीमाओं से बाहर निकलकर पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। गंगा को साफ और निर्मल बनाए रखने की मांग को लेकर उन्होंने कई बार अनशन किया और आखिरकार साल 2018 में 111 दिनों के अनिश्चित काल के अनशन के दौरान उनका निधन हो गया।
इंजीनियर से पर्यावरण वैज्ञानिक बनने का सफर
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ था। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की (अब आईआईटी रुड़की) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। शुरुआत में उन्होंने सिंचाई विभाग में डिजाइन इंजीनियर के रूप में काम किया।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी गहरी रुचि के चलते उन्होंने अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले से पर्यावरण इंजीनियरिंग में पीएचडी की थी। इसके बाद वे आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर बन गए और पर्यावरण इंजीनियरिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें उनके उत्कृष्ट अध्यापन के लिए सम्मानित भी किया गया।
देश के पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से भी जुड़े
पर्यावरण के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) का पहला सदस्य सचिव नियुक्त किया। इस जिम्मेदारी के दौरान उन्होंने भारत में प्रदूषण नियंत्रण की नींव मजबूत करने, पर्यावरण नीतियां तैयार करने और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यों में अहम योगदान दिया।
IIT छोड़ चुना अलग रास्ता
लगभग 17 वर्षों तक IIT कानपुर में अध्यापन के बाद प्रोफेसर अग्रवाल ने एक नया रास्ता चुना। उन्होंने अपने कुछ छात्रों के साथ मिलकर पर्यावरण से जुड़ी तकनीकी समस्याओ का समाधान करने के लिए एक कंपनी भी शुरू की, लेकिन धीरे-धीरे उनका पूरा जीवन समाज सेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित हो गया।
11 जून 2011 को गंगा दशहरा के पावन अवसर पर उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और उन्हें स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से नई एक नई पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मां गंगा की अविरलता और निर्मलता की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया। मां गंगा के संरक्षण के लिए उनका संघर्ष सिर्फ एक आंदोलन ही नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने का उनका आजीवन लक्ष्य बन गया था।
गंगा बचाने के लिए कई बार किया अनशन
उन्होने साल 2008 में पहली बार गंगा संरक्षण को लेकर अनशन शुरु किया। इसके बाद वे लगातार सरकार के सामने अपनी मांगें रखते रहें। उनका कहना था कि गंगा केवल एक नदी मात्र नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है, जिसकी अविरल धारा को बनाए रखना बेहद जरूरी है।
जब केंद्र सरकार को भी झुकना पड़ा
भागीरथी नदी पर प्रस्तावित लोहारी नागपाला जल विद्युत परियोजना के खिलाफ साल 2010 में उन्होंने 38 दिनों तक अनशन किया। उनके इस आंदोलन के बाद तत्कालीन सरकार ने इस परियोजना पर रोक लगाने का फैसला लिया। इस सफल आंदोलन को उनकी सबसे बड़ी पर्यावरणीय जीत माना गया।
2018 में 111 दिन का अनशन और चार प्रमुख मांगें
22 जून 2018 में उन्होने आमरण अनशन शुरू किया। उनकी चार प्रमुख मांगें थीं:
गंगा सुरक्षा अधिनियम लागू किया जाए
गंगा पर बन रही और जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाई जाए।
गंगा में खनन पूरी तरह बंद किया जाए।
गंगा संरक्षण के लिए एक स्वतंत्र और सशक्त परिषद का गठन किया जाए।
उन्होंने सरकार को कई पत्र लिखे, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित पत्र भी शामिल थे। उनका कहना था कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे अपना अनशन अनिशचित काल तक जारी रखेंगे।
पानी भी छोड़ दिया, फिर अस्पताल में भर्ती
अनशन के दौरान उन्होंने अक्टूबर 2018 में पानी पीना भी छोड़ दिया था। तब हरिद्वार प्रशासन ने उन्हें एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया। उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था जिसके चलते 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया। उनके इस बलिदान ने गंगा संरक्षण और पर्यावरण नीति को लेकर देशभर में एक नई बहस छेड़ दी।
अब फिर से क्यों हो रही है चर्चा?
सोनम वांगचुक के जंतर-मंतर पर जारी अनशन और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर लगातार हो रही चर्चा के बीच सोशल मीडिया पर IIT प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के संघर्ष को एक बार फिर याद किया जा रहा है। उनके समर्थकों का मानना है कि उन्होंने वैज्ञानिक सोच और आध्यात्मिक आस्था को एक साथ जोड़कर गंगा संरक्षण की मुहिम को एक देशव्यापी मुद्दा बनाया। हालांकि, कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उनकी कई महत्वपूर्ण मांगों पर अपेक्षित स्तर पर कार्रवाई नहीं हो सकी। यही कारण है कि गंगा की रक्षा के लिए उनका संघर्ष आज भी भारत के सबसे बड़े हुए पर्यावरण आंदोलनों में शामिल माना जाता है।
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