Bashir Badr Passed Away: उर्दू गज़ल के मशहूर शायर डॉक्टर बशीर बद्र अब नहीं रहे। रामनगरी अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र ने आज मध्य प्रदेश के भोपाल में अंतिम सांस ली। वह 91 साल के थे और डिमेंशिया नामक बीमारी का सामना कर रहे थे। डिमेंशिया की वजह से उनकी याद्दाश्त लगातार कमजोर होती चली गई लेकिन उर्दू अदब की शायरी आज भी लोगों के दिलों में धड़कती है। बशीर बद्र के जाने से साहित्य और शायरी जगत में शोक की लहर है।
शायर बशीर साहब ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की थी और बाद में उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में लंबा समय बिताया। शिक्षा क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। एक समय था जब उनके बिना मुशायरे अधूरे माने जाते थे और जब कभी उन्हें मुशायरों की याद आती तो अक्सर वो इरशाद-इरशाद कहने लगते थे।
बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत, तन्हाई, शहरी जिंदगी की भागदौड़ की झलक देखने को मिलती हैं उनकी शायरी और गज़लों ने देश दुनिया के लोगों के दिलों को छुआ। उनके कई शेर आज भी मंचों पर सुनने को मिल जाते है जिनमें से एक हैं–
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’
बशीर साहब की सबसे खास बात ये थी कि उन्होंने उर्दू गज़ल को पारंपरिक और भारी-भरकम शब्दों के जाल से आजाद कराया था और अपनी शायरी में फारसी या अरबी के कठिन लफ्जों की जगह बेहद सरल और आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया था। एक समय पर उनकी शायरी की गूंज सड़क से लेकर संसद तक हुआ करती थी।
जब 15-16 साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया तो मजबूर होकर उन्हें पुलिस की नौकरी ज्वॉइन की लेकिन शायरी से उनका लगाव बरकरार रहा। इसी बीच जब उन्हें तरक्की की पेशकश हुई तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया और एक शेर लिखा–
‘बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना, दरिया जहां समंदर से मिला दरिया नहीं रहा’
उन्होंने जीवन के तमाम पहलुओं को अपनी गज़ल और शायरी में जगह दी साथ ही साथ उनके जीवन में आने वाले उतार–चढ़ावों को भी अपनी गजलों में उतारा। उनकी शायरी महज़ इश्क, दर्द, और हुस्न तक ही सीमित नहीं रहीं बल्कि देश के गंभीर मुद्दों पर भी बेबाकी से लिखा। देश के बंटवारे की तकल़ीफ को बयां करते हुए बशीर साहब ने कहा-
‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों’
बता दें कि, साल 1987 के मेरठ दंगों ने बशीर बद्र की पूरी जिंदगी को ही तहस-नहस कर दिया। जब दंगाइयों की उग्र भीड़ ने उनके खूबसूरत घर को न सिर्फ बेरहमी से लूटा, बल्कि उसे आग के हवाले भी कर दिया और उनकी डिग्रियां, नायाब शायरी के पन्ने सबकुछ पलभर में जलकर राख हो गए। यह हादसा उनके लिए काफी तकलीफ देने वाला था इसी दर्द को उन्होंने अल्फ़ाजों में समेटा और लिखा-
‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’
मेरठ दंगों के बाद बशीर बद्र गुमनामी में चले गए और कुछ वक्त बरेली में ही गुजारा फिर दोस्तों की सलाह पर भोपाल पहुंचे और यहां के शांत माहौल ने उनके जख्मों पर मरहम लगाने का काम किया और अपने अंतिम समय तक भोपाल में ही रहें।
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