3 जून 1947: भारत के इतिहास का वो दिन जिसे सबसे दर्दनाक दिनों में से एक माना जाता हैं जिसके सिर्फ एक फैसले ने लाखों लोगों को न भुलाए जा सकने वाले जख़्म दिए। इसी दिन ब्रिटिश सरकार ने वो प्रस्ताव पेश किया जिसे 3 जून प्लान या माउंटबेटन प्लान के नाम से भी जाना जाता है। आज ही के दिन वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने एक योजना पेश की, जिसमें भारत के विभाजन और पाकिस्तान के गठन की नींव रखी, इसके बाद देश में ऐसी घटनाएं घटी जिसे आज भी भारत और पाकिस्तान के लोग भूल नहीं सकते।
दूसरे विश्व युद्ध और भारत में बढ़ते तनाव के चलते ब्रिटिश सरकार पर भारत को स्वतंत्र करने का दबाव बनने लगा और तभी भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं से साथ विचार विमर्श कर इस प्रस्ताव का अंतिम खाका पेश किया जिसमें भारत और पाकिस्तान नाम के दो डोमिनियन स्टेट बनाने की बात कही।
साथ ही साथ भारत में रहने वाली 565 देशी रियासतों के लिए ये छूट दी गई कि वे या तो भारत में शामिल हो या पाकिस्तान में या फिर वे पूरी तरह स्वतंत्र रह सकते हैं। इसी के साथ दोनों देशों को सत्ता सौंपने की तारीख 15 अगस्त 1947 तय की गई। जिससे लाखों लोगों को अपना घर छोड़कर नई सीमाओं के पार जाना पड़ा। सांप्रदायिक हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और करोड़ों लोग विस्थापित हुए। इतिहासकार इसे 20वीं सदी के सबसे बड़े जन-पलायनों में से एक मानते हैं।
वहीं, इस योजना में पंजाब और बंगाल के मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के विभाजन के लिए सर रेडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग का गठन किया गया और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया गया जिससे यह तय किया जा सके वे किस देश के साथ रहना चाहते हैं।
कुल मिलाकर, माउंटबेटन के इस प्रस्ताव से भारत स्वतंत्र तो हुआ। लेकिन इसके बदले में देश को एक दर्दनाक और खून-खराबे वाले विभाजन की भारी कीमत चुकानी पड़ी साथ ही साथ उपमहाद्वीप को ऐसे जख्म भी दिए, जिनकी याद आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। बंटवारे का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने करोड़ों परिवारों की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया।
दो समुदाय में बढ़ रहा था तनाव
दरअसल, 1940 के दशक के मध्य तक, ये साफ हो गया था कि भारत पर ब्रिटिश राज खत्म होने वाला है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटेन की हालत कमजोर हो गई थी। भारत की आजादी के लिए आंदोलन तेज हो गया था। इस आंदोलन को इंडियन नेशनल कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कई दूसरे दलों ने मिलकर चलाया था। हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था।
मुस्लिम लीग के सीनियर नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग रखी थी। उन्होंने 'टू-नेशन थ्योरी' के आधार पर ये मांग रखी थी। इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेता मसलन जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी, देश के बंटवारे के खिलाफ थे। लेकिन जब एकता का कोई और रास्ता नहीं दिखा, तो उन्होंने इसे मजबूरी में मान लिया। आज ही के दिन भारत के अंतिम वायसरॉय ने देश के बंटवारे का ऐलान कर दिया। इसके बाद भारत का इतिहास और भूगोल दोनों पूरी तरह से बदल गए।
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