Punjab: सिर्फ नाम बदला और कुछ नहीं, तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद दिलजीत दोसांझ की सतलुज रिलीज

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पंजाबी रॉकस्टार और बेहतरीन एक्टर दिलजीत दोसांझ की मच-अवेटेड फिल्म 'सतलुज’ आखिरकार दर्शकों के बीच आ चुकी है। भारत के सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड के साथ करीब तीन साल तक चली लंबी कानूनी जद्दोजहद के बाद, यह फिल्म 3 जुलाई को ज़ी 5 ग्लोबल पर रिलीज कर दी गई है। सबसे बड़ी और राहत की बात यह है कि इस सोशल ड्रामा फिल्म को बिना किसी कट के, पूरी तरह से उसी रूप में स्ट्रीम जैसा इसे बनाया गया था। फिल्म के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आते ही दिलजीत दोसांझ ने सोशल मीडिया पर एक बेहद इमोशनल नोट शेयर कर अपना रिएक्शन दिया है और फैंस का शुक्रिया अदा किया है।

सेन्ट्रल फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड ने इसमें 127 कट्स लगाने का निर्देश दिया था जिस पर काफी विवाद हुआ और फिल्म अटकी रह गई। लेकिन अब फाइनली इसे चुपके से ओटीटी पर रिलीज कर दिया गया और वह भी नए टाइटल 'सतलज' के साथ। हां, इसमें कोई कट भी नहीं लगाया गया है। यह फिल्म असल कहानी पर आधारित है, जिसका सिर्फ दर्शक ही नहीं, बल्कि दिलजीत दोसांझ को भी लंबे समय से इंतजार था। अब जब 'सतलज' रिलीज हुई, तो दिलजीत भावुक हो गए। उन्होंने फिल्म में जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है, जो पहले ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट थे। बताया जाता है कि पुलिस ने उन्हें किडनैप करके उनका फेक एनकाउंटर कर दिया था।

उनकी मच अवेटेड मूवी 'पंजाब 95' जो सेंसर बोर्ड के साथ चल रहे विवाद के कारण तीन साल से रिलीज नहीं हो सकी थी, उसे 3 जुलाई को चुपके से ओटीटी पर रिलीज कर दिया गया। यह जसवंत सिंह खालरा पर आधारित है, जो 25 हजार लापता सिखों के लिए लड़े और बिना सबूत लड़कों को आतंकी बताकर फेक एनकाउंटर के खिलाफ आवाज उठाई थी।

एक्टर दिलजीत दोसांझ ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक स्टोरी शेयर भी किया जिसमें उन्होंने लिखा, 'वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह। आखिरकार आज जब हमारी फिल्म 'जिन्होंने मैं अपने सभी शुभचिंतकों का दिल से धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने अपनी अरदास (प्रार्थनाओं) और प्यार से हमारा अब तक साथ दिया। यह फिल्म जितनी हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।'

एक्टर ने यह भी लिखा, 'एक टीम के रूप में हम वाहेगुरु के बेहद शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमें अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर टिके रहने की ताकत दी, और इस सफर को अंत तक ले जाने का हमें हौंसला दिया व हमारा सब्र भी बख्शा। शहीद जसवंत सिंह खालरा जी का जीवन हमेशा ही निस्वार्थ सेवा और प्रेरणा का स्रोत रहा है। उनकी असीसों (आशीर्वाद) का इस फिल्म के बनने से लेकर अब तक के सफर में अमूल्य सहारा रहा है। यह उनकी कहानी है। यह उनकी इंसानियत के लिए लड़ी गई लड़ाई की कहानी है। हमें यह उनकी इंसानियत के लिए लड़ी गई लड़ाई की कहानी है। हमें फिल्म का पहले वाला टाइटल नहीं मिल सका। अब इस फिल्म का नाम 'सतलुज' है। 

बात 90 के दशक की है। उस वक्त पंजाब में आतंक अपने चरम पर था। तब केपीएस गिल पंजाब के डीजीपी थे। उस वक्त खालिस्तानी आंदोलन भी जोर पकड़े हुआ था। फिर 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भी हत्या कर दी गई, जिसके बाद पंजाब में सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए। करीब एक दशक तक पंजाब ने एक ऐसा खूनी दौर देखा, जिससे हर कोई सहम उठा। उसी दौरान पंजाब पुलिस पर एक आरोप लगा कि वह लड़कों को बिना सबूत आतंकवादी बताकर उनका एनकाउंटर कर रही है।

मानवाधिकार संगठन से जुड़े जसवंत सिंह खालरा ने यह दावा करके चौंका दिया कि पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर किया। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले कई श्मशान घाट जाकर वहां पड़ताल की और पता चला कि करीब 25 हजार सिख लापता हैं। वो साल 1984 से 1994 के दौरान लापता हुआ। जसंवत सिंह खालरा ने दावा किया कि पुलिस ने उनमें से करीब 2000 सिखों का या तो लावारिस बताकर अंतिम संस्कार कर दिया या नदी में उनकी लाशें बहा दीं।

दरअसल, जसवंत सिंह खालरा अमृतसर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में डायरेक्टर थे, पर साथ ही ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट भी थे। एक दिन जब उनके दोस्त और साथ काम करने वाले प्यारा सिंह लापता हुए, तो उनकी खोज में वह श्मशान घाट तक पहुंच गए। वहां जसवंत सिंह को पता चला कि वहां बड़ी संख्या में लाशों को लावारिस बताकर अंतिम संस्कार किया जा रहा है। इसी की जांच करते हुए और तह में गए तो फेक एनकाउंटर की बात सामने आई।

जसवंत सिंह ने साल 1995 में जे.एस. ढिल्लो के साथ मिलकर एक प्रेस नोट तैयार किया था, जिसमें बताया था कि पुलिस शवों को श्मशान घाटों पर ले जाती है, और वहां उन्हें लावारिस बताकर अंतिम संस्कार करवा दिया जाता है।

इस प्रेस नोट में उन्होंने बताया था कि कैसे खालड़ा, कैरों, वल्टोहा और हरिका जैसे गांवों से ढेरों लावारिस लाशें लाई गईं। साथ ही दावा किया था कि 1 जून 1984 से 1994 के आखिर तक अमृतसर में करीब 2000 लाशों को लावारिस बताकर अंतिम संस्कार किया गया। जसवंत सिंह के इस प्रेस नोट ने खलबली मचा दी और फिर इसके कुछ महीनों बाद जसवंत सिंह खालरा गायब हो गए।

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जसवंत सिंह खालरा को पुलिस ने उठा लिया था, और यह बात उस घटना के चश्मदीद गवाह रहे राजीव ने बताई थी। उन्होंने बताया था कि 6 सितंबर 1995 को वह जसवंत सिंह के घर बैठे थे। जसवंत बाहर कार धो रहे थे और एक पत्रकार का इंतजार कर रहे थे। वो सभी एक श्मशान घाट जाने वाले थे। पर तभी पंजाब पुलिस के दो डीएसपी  तीन इंस्पेक्टर अपने साथ तीन-चार लोगों को लेकर पहुंचे और जसवंत सिंह को उठाकर ले गए। राजीव ने बताया था कि उस वाकये के करीब डेढ़ महीने बाद पुलिस ने जसवंत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी और लाश हरिके नहर में फेंक दी थी। यानी उनका भी एनकाउंटर कर दिया गया था।

इस मामले की सीबीआई जांच की गई थी, जिसमें राजीव ने गवाही दी और पंजाब में स्पेशल पुलिस अफसर रहे कुलदीप ने भी गवाही दी, जिनके सामने जसवंत सिंह को गोली मारकर लाश फेंकी गई थी। कुलदीप ने बताया था कि जसंवत को मारने से पहले बुरी तरह टॉर्चर किया गया था। जांच में बाद में सीबीआई ने चार्जशीट फाइल की और उसमें माना था कि पुलिस ने ही जसवंत सिंह खालरा को अगवा किया और हत्या की। इस मामले में जहां चार पुलिस अफसरों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई, वहीं अन्य आरोपियों को सात-सात साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।

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